Wednesday, 28 November 2012

संसद चलने का फार्मूला तैयार


नई दिल्ली [जाब्यू]। रिटेल में एफडीआइ [प्रत्यक्ष विदेशी निवेश] के मुद्दे पर संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष का गतिरोध खत्म होने के प्रबल आसार हैं। इसके लिए फार्मूला तैयार हो गया है। सरकार वोटिंग के नियम के तहत चर्चा पर राजी हो गई है, लेकिन वह विपक्ष से आर्थिक सुधारों से जुड़े विधेयकों पर अड़ंगा न लगाने का वादा चाहती है। यद्यपि, सरकार खुद वोटिंग के साथ बहस पर राजी होने का एलान करने के बजाय मामला लोकसभा अध्यक्ष व राज्यसभा सभापति पर छोड़ रही है। लोकसभा व राज्यसभा में विपक्ष के नेताओं सुषमा स्वराज और अरुण जेटली से मुलाकात के बाद संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने कहा कि ज्यादातर दल सिर्फ बहस चाहते हैं, वोटिंग नहीं। यह जानकारी हम लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को देंगे, वही अंतिम फैसला करेंगे।
सूत्रों के मुताबिक, द्रमुक के सरकार के पक्ष में वोटिंग के लिए तैयार होने और सपा व बसपा की तरफ से मिले आश्वासन के बाद सरकार एफडीआइ पर मत विभाजन के तहत चर्चा का मन बना चुकी है। हालांकि, सरकार के कार्यकारी फैसले पर मत विभाजन के तहत चर्चा की परंपरा से वह बचना चाहती है। इसके बावजूद सदन न चलने देने पर आमादा प्रमुख विपक्ष भाजपा के तेवर देखते हुए वह इस विषय में सोचने पर मजबूर हुई। संप्रग की बैठक में आंकड़ों का गणित साधने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पूरे नंबर होने का दावा कर इसके संकेत भी दे दिए थे। मगर सरकार विपक्ष से यह आश्वासन लेना चाहती है कि अन्य आर्थिक फैसलों में वह अड़ंगा नहीं डालेगी।
इस विषय में दो दिन पहले वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी सुषमा व जेटली से मुलाकात की थी। सूत्रों के मुताबिक, बैंकिंग संशोधन विधेयक में तो विपक्ष को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन सुषमा ने बीमा संशोधन विधेयक पर जरूर कुछ दिक्कतें बताई। कुल मिलाकर विपक्ष से इस मोर्चे पर भी कोई स्पष्ट आश्वासन सरकार नहीं ले सकी। यद्यपि, सदन चलाने की दिशा में कुछ सहमति बनने के संकेत जरूर मिले। बुधवार को संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने सुषमा व जेटली को संसद का गणित दिखाते हुए समझाने की आखिरी कोशिश की, लेकिन दोनों ने बगैर मतदान के चर्चा को औचित्यहीन करार दिया। वैसे सरकार अंदरखाने इसके लिए तैयार हो चुकी है और इसके संकेत कमलनाथ ने खुद भी दिए। उन्होंने कहा कि सरकार मत विभाजन वाले नियम 184 के तहत चर्चा को अपनी ओर से स्वीकार नहीं कर सकती है। यह निर्णय पीठासीन अधिकारियों पर छोड़ दिया है।
इस सवाल पर कि विपक्ष के वोटिंग कराने पर अड़े रहने को देखकर सरकार इसके लिए तैयार हुई है, उन्होंने कहा कि हम इसके खिलाफ नहीं हैं। हमारे पास पर्याप्त संख्याबल है। कमलनाथ ने विपक्ष के नेताओं से मुलाकात से पहले लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और राज्यसभा सभापति हामिद अंसारी से भेंट भी की थी। इधर, सुषमा स्वराज ने संसद में चर्चा के बाद वोटिंग की माग को सही बताते हुए कहा, इससे सरकार गिर नहीं जाएगी। केवल एफडीआइ का निर्णय गिरेगा। अगर संसद का बहुमत इस निर्णय के विरुद्ध है तो सरकार को उसका आदर करना चाहिए।
फिर संकटमोचक बन सकती हैं सपा और बसपा:
संसद में सरकार की तरफ से खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआइ] पर बहस के साथ वोटिंग का मन बना लेने के बाद सबकी नजरें एक बार फिर बाहर से समर्थन दे रही सपा और बसपा पर टिक गई हैं। कई बार सरकार के संकटमोचक बन चुके इन दोनों दलों में बसपा ने तो अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन एफडीआइ का विरोध कर रही सपा के सामने यह नई चुनौती आ गई है। हालांकि, सरकार दोनों ही दलों को लेकर आश्वस्त है। माना जा रहा है कि वोटिंग की नौबत आई तो वे विरोध भले जताएं, लेकिन मतदान में शामिल होने के बजाय सदन से बहिर्गमन को प्राथमिकता दे सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक एफडीआइ पर द्रमुक की तरफ से हरी झंडी देर में भले मिली, लेकिन सपा-बसपा की तरफ से सकारात्मक संकेत पहले ही मिल चुके थे। अलबत्ता, संसद में इस पर चर्चा के दौरान दोनों ही दल सरकार का विरोध करेंगे। उनकी नजरों में यह किसानों व छोटे व्यापारियों को नुकसान पहुंचाने वाला कदम है। लिहाजा, सब कुछ कहने के बाद भी वोटिंग की नौबत आने पर सरकार से विरोध जताते हुए सदन से बहिर्गमन कर सकते हैं।
गौरतलब है कि 543 सदस्यों वाली लोकसभा में संप्रग के 265 सदस्य हैं। वहां सपा के 22 और बसपा के 21 सदस्य हैं। वोटिंग की स्थिति में दोनों दल बहिर्गमन करते हैं तो कुल सदस्यों में 43 कम हो जाएंगे। तब बहुमत के लिए 250 सदस्यों की ही जरूरत होगी। हालांकि राज्यसभा में सरकार के लिए दिक्कत जरूर है। 244 सदस्यों वाले इस सदन में संप्रग के 94 सदस्य हैं। मनोनीत दस सदस्य भी सरकार का समर्थन कर सकते हैं। फिर भी विपक्ष में 140 सदस्य होंगे। यदि सपा के नौ सदस्य बहिर्गमन भी कर जाएं और बसपा के 15 सदस्य सरकार कासाथ दे दें तो राज्य सभा में भी सरकार के लिए संकट नहीं रह जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि बहिर्गमन से सरकार का काम हो गया तो ठीक है, नहीं तो जरूरत पड़ने पर बसपा मतदान में भी शामिल हो सकती है। बसपा प्रमुख मायावती पहले ही कह चुकी हैं एफडीआइ पर जब चर्चा होगी, वह तभी उस पर फैसला करेंगी। उधर, सपा के एक नेता ने कहा कि पार्टी एफडीआइ के विरोध में है, तभी तो उसने उत्तर प्रदेश में इसे लागू नहीं करने का फैसला किया है। फिर भी पार्टी सांप्रदायिक ताकतों के साथ कभी नहीं खड़ी होगी।

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